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Sunday, February 21, 2016

Desh ke 33 budhijivion ne jnu mamle par ek chitti jaari Ki

पिछले दिनों दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जो घटना घटी वह चिन्ताजनक है। शैक्षणिक परिसरों में नियोजित ढंग से देश विरोधी नारे हमारी चेतना को झकझोरते हैं। देश के नामी शैक्षणिक परिसर में यह दुआ पढ़ी जाय कि ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह’। विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी का संकल्प लिया जाय। संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरू को शहीद घोषित किया जाय। यह शर्मनाक और व्यथित करने वाला है। हम इसे देशविरोधी ताकतों की सुनियोजित साजिश मानते हैं। हमें यकीन है कि सोच के स्तर पर ऐसे नारे लगाने वाले लोग आतंकवादी मौलाना मसूद अजहर से कम खतरनाक नहीं है।
सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ वैचारिक असहमति का हम स्वागत करते हैं। लेकिन देशद्रोह की कीमत पर नहीं। जो लोग ऐसे नारों को देशद्रोह नहीं मानते उन्हें देशप्रेमी भी नहीं कहा जा सकता है। जे.एन.यू. की घटना एक खतरे का संकेत है। इस खतरे से सतर्क होने के बजाए कुछ लोग इसे अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में ढक रहे हैं। यह अभिव्यक्ति की आजादी कैसे हो सकती है जिसमें अपने राष्ट्र के प्रति कोई आस्था न हो? जो नफरत पैदा करती है। जो देश के सर्वोच्च न्यायिक फैसले पर सवाल उठाती हो। इन कुत्सित ताकतों के समर्थन में भी कुछ लोग राजनैतिक फायदे के लिए खडे हो गए है। जो यह भूल जाते हैं कि अफजल गुरू का महिमा मण्डन देश की प्रभुसत्ता, सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति और संसद का अपमान है।
 
असहमति और बहस के हक के हम हिमायती हैं। पर क्या देश की बर्बादी और कश्मीर की आजादी के लिए बहस होनी चाहिए। क्या देश को सोलह टुकड़े करने की मांग पर बहस की गुंजाइश है। क्या अफजल गुरू की फांसी और इण्डिया गो बैक के नारे असहमति के दायरे में आते हैं। आप बेशक नरेन्द्र मोदी से नफरत करें। भाजपा से घृणा करें। पर देश से तो प्यार करें। यह कौन सी वैचारिक आजादी है ! कि जो नारे सीमा पार से लगे। जो कश्मीर में अलगाववादियों के घरों से लगाये जाये। वहीं दिल्ली और जादवपुर के शैक्षणिक परिसरों से भी लगे। और उसके भी समर्थन में वैचारिक जुगाली करते कुछ विवेक शून्य लोग खड़े हों।
 
हमारा मानना है कि देश विरोधी ताकतों ने एक षड़यंत्र के तहत लोगों को भड़काने के लिए यह कारवाई की है। ताकि लोग भड़के और इसे देशव्यापी राजनैतिक ध्रुवीकरण का स्वरूप दिया जाय। साजिश रचने वालों को यह भी मालूम है कि ऐसा करने से सरकार इसे रोकने का अपना काम करेगी। और फिर इसे सरकारी दमन और आपातकाल से बुरा घोषित कर अस्थिरता का माहौल बनाया जाएगा। हम कथित देशभक्तों की हिंसा का भी समर्थन नहीं करते। पहले असहिष्णुता पर देश में माहौल बनाने की कोशिश हुई। फिर दलित छात्र उत्पीड़न का बनावटी माहौल बना। जब वो सब नहीं चले तो अब वैचारिक आजादी की आड़ में देश विरोधी साजिश। हम इस साजिश की निंदा और विरोध करते हैं और आमजन से अपील करते हैं कि वे इन देशद्रोही ताकतों के मंसूबों को कामयाब न होने दें।  


2 comments:

hemen varma said...

Delighted that some intellectuals have taken this bold step not fearing for orchestrated pseudoism of leftist, stupid MSM and perverted journalists. Kudos to all of you.

Neha said...

I am glad people like you all are speaking up... when flying national flag becomes polarizing,chanting "bharat ki barbadi" dissent/FOE, singing national anthem a matter of choice and anyone speaking in favour of army is viciously targeted....its needed more than EVER.. more power to all of you... keep going !!!